बिहार में बाहुबल का इतिहास काफी पुराना है। इसकी धमक सूबे के बाहर भी सुनी जाती रही है। एक वक्त था जब बाहुबलियों ने बिहार में अपनी समानांतर सरकारें भी चलाईं। धन और बाहुबल के जरिए इन्होंने सरकार बनाने से लेकर बिगाड़ने तक का खेल खेला। कभी राजनेताओं की जीत पक्की करनेवाले बाहुबलियों को अपने दमखम पर इतना भरोसा हो गया कि उन्होंने खुद चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाना शुरू कर दिया। 
बाहुबली छवि के काली पाण्डेय ने 1984 में गोपालगंज से निर्दलीय सांसद के तौर पर चुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में इंट्री की। हालांकि इससे पहले बाहुबली वीरेंद्र सिंह मोहबिया निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा पहुंच चुके थे। इसके बाद यह चलन रुकने की जगह बढ़ता चला गया। 90 और 2000 के दशक में यह चरम पर रहा। काली पाण्डेय के बाद निर्दलीय विधायक के तौर पर पहली बार विधानसभा पहुंचे बाहुबली दिलीप सिंह और प्रभुनाथ सिंह ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और राजनीति में लम्बी पारी खेली।
बिहार की राजनीति में कई बाहुबलियों ने किस्मत आजमाई, पर चर्चित चेहरों में शहाबुद्दीन, सूरजभान सिंह, आनंद मोहन, प्रभुनाथ सिंह, राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, सुरेन्द्र यादव, रामा सिंह सांसद तक बन गए। अनंत सिंह, सुनील पाण्डेय, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला, हुलाष पाण्डेय, धूमल सिंह, बोगो सिंह, नीरज कुमार बबलू, रणवीर यादव, रीतलाल यादव, अमरेन्द्र पाण्डेय और बच्चा चौबे सरीखे विधानसभा और विधान परिषद का चुनाव जीतने में कामयाब रहे। 90 के दशक में बाहुबली छवि वाले बृज बिहारी प्रसाद ने भी राजनीति में लम्बी पारी खेली। बाहुबलियों की इंट्री के बाद बिहार में राजनीतिक हत्याओं का दौर भी खूब चला। खुद कई बाहुबली इसके शिकार हुए। इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद का है। आईजीआईएमएस में सरेआम उनकी हत्या हुई थी। वहीं हेमंत शाही, देवेन्द्र दूबे और छोटन शुक्ला इसी राजनीतिक वर्चस्व की खातिर मार दिए गए थे। अजीत सरकार और अशोक सिंह की विधायक रहते हत्या हुई थी।  
उत्तर बिहार में भारी पड़ते रहे हैं बाहुबली
उत्तर बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बाहुबली बंदूक के बल पर वोट बटोरते रहे हैं। बूथों पर बंदूकबाजों की चलती थी और लाशें भी गिरतीं थीं। एक वह भी दौर था जब बिहार में होनेवाले अधिकतर चुनाव रक्तरंजित होते थे। जब तक ईवीएम से मतदान आरंभ नहीं हुआ था, बाहुबली और उनके गुर्गे बूथों पर कब्जा जमाते थे। कई दशकों तक चुनाव में वीरेंद्र सिंह मोहबिया जैसे बाहुबलियों का बोलबाला रहा। गोपालगंज में काली पांडेय, सीवान में मोहम्मद शहाबुद्दीन, शिवहर में आनंद मोहन और मुजफ्फरपुर-वैशाली में कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला जैसे बाहुबलियों की उम्मीदवारी से चुनावी बाजियां पलटती रहीं। चंपारण की धरती पर भी कई बाहुबलियों का आमना-सामना हुआ जिसमें कई अब दिवंगत हो चुके हैं। चंपारण के जंगलों में भी दस्यु समूहों का काफी प्रभाव था जो येन-केन-प्रकारेण चुनावी राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करते थे।
बिहार विधानसभा चुनाव 1980 में वैशाली के जंदाहा निर्वाचन क्षेत्र में कुख्यात वीरेंद्र सिंह मोहबिया निर्दलीय प्रत्याशी बना। उसके गुर्गों ने ‘वीर मोहबिया कड़ाम-कड़ाम, मुहर मारो धड़ाम-धड़ाम’ का नारा दिया। तब यह भी आरोप लगे थे कि पागल हाथी पालने के शौकीन मोहबिया ने वोटरों को अपने पक्ष में मतदान के लिए आतंकित किया। बड़े पैमाने पर बूथों पर कब्जा कर स्टैंपिंग की गई। निर्दलीय मोहबिया ने कांग्रेस उम्मीदवार को शिकस्त दी थी। हालांकि बाद के चुनाव में मोहबिया हार गया और उसकी हत्या भी हो गई।
विधानसभा चुनाव 1990 में बाहुबली कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला की उम्मीदवारी से वैशाली का लालगंज विधानसभा क्षेत्र सुर्खियों में आया। कांटे के मुकाबले में छोटन शुक्ला की हार हुई, लेकिन राजनीति के गलियारे में छोटन शुक्ला का बोलबाला कायम हुआ। आनंद मोहन ने 1995 के चुनाव में पूर्वी चंपारण के केसरिया क्षेत्र से छोटन शुक्ला को उम्मीदवार बनाने की घोषणा की। छोटन शुक्ला की व्यापक तैयारी से केसरिया का तापमान बढ़ गया, लेकिन 4 दिसंबर 1994 की रात केसरिया से लौटते समय मुजफ्फरपुर में छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई। छोटन शुक्ला की पत्नी किरण शुक्ला को केसरिया से उम्मीदवार बनाया गया, लेकिन वे हार गयीं। छोटन शुक्ला और पूर्व मंत्री ब्रज बिहारी प्रसाद के बीच वर्षों तक चले गैंगवार से मुजफ्फरपुर और आसपास का क्षेत्र थर्राया रहा।
लोकसभा चुनाव 1998 में शिवहर सीट पर ऑल इंडिया राष्ट्रीय जनता पार्टी के उम्मीदवार आनंद मोहन, समता पार्टी के हरिकिशोर सिंह और जनता दल के अनवारुल हक के बीच बहुचर्चित मुकाबला हुआ। रघुनाथ झा उस चुनाव में हरिकिशोर सिंह की मदद कर रहे थे। धनकौल गांव के पास आनंद मोहन और रघुनाथ झा का काफिला आमने-सामने आ गया था। आरोप यह भी लगे कि दोनों ओर से समर्थकों में जमकर रोड़ेबाजी हुई थी। इधर कलेक्ट्रेट में अनवारुल हक के समर्थकों ने शक्ति प्रदर्शन किया। बड़ी वारदात टालने के लिए प्रशासन ने आनंद मोहन और रघुनाथ झा को डीएम-एसपी के चैंबर में अलग-अलग बैठाया था। उस चुनाव में आनंद मोहन ने पूर्व विदेश मंत्री हरि किशोर सिंह को शिकस्त दी थी। गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया हत्याकांड में सजा मिलने के बाद आनंद मोहन फिलहाल सहरसा जेल में बंद हैं।
मोकामा से विधायक रहे दिलीप, सूरजभान व अनंत
पटना जिले में दबंग और अपराधी छवि के नेता चुनाव लड़ते रहे हैं। स्थानीय राजनीति भी प्रभावित होती रही है। पटना की स्थानीय राजनीति में बाहुबलियों की इंट्री निर्दलीय और दलीय प्रत्याशी के रूप में हुई। जिले का मोकामा ऐसा विधानसभा क्षेत्र हैं जहां से तीन बाहुबली विधानसभा में पहुंचे। इसमें दिलीप सिंह, सूरजभान सिंह और अनंत सिंह का काम शामिल है। पूर्व मंत्री दिलीप सिंह वर्तमान विधायक अनंत सिंह के बड़े भाई थे। उनका निधन हो चुका है। अनंत सिंह के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। हालांकि, कुछ में ये बरी भी हो चुके हैं। एमएलसी रीतलाल यादव पर रंगदारी और हत्या के मामले हैं। पूर्व मंत्री और बाढ़ से राजद के पूर्व सांसद विजय कृष्ण को हत्या के एक मामले में सजा हो चुकी है।
कोसी, सीमांचल व पूर्वी बिहार की राजनीति में भी रहे बाहुबली
कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार में कुछ जनप्रतिनिधि बाहुबली और आपराधिक पृष्टभूमि के रहे हैं।  सुपौल के छातापुर विधानसभा से अभी नीरज कुमार सिंह बबलू भाजपा से विधायक हैं। इनपर सहरसा और सुपौल के थानों में डेढ़ दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। वहीं त्रिवेणीगंज से 1994 में जनता दल से विधायक बने योगेंद्र सरदार पर विधायक रहते गैंगरेप का आरोप लगा था। योगेन्द्र सरदार को जिले की एक अदालत ने हाल में ही उम्रकैद की सजा सुनाई है।
पूर्व सांसद पप्पू यादव निर्दलीय विधायक बनने के बाद राजद के टिकट पर संसद रह चुके है। लोजपा और सपा में रहने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी बना ली है। इनके के खिलाफ पूर्णिया और मधेपुरा के अलग- अलग थाने में केस दर्ज है। ब्रजकिशोर यादव उर्फ बच्चन यादव साल 2010 में बिहारीगंज विधानसभा क्षेत्र से जनता दल सेक्यूलर से चुनाव लड़ चुके हैं। इनके खिलाफ कई केस दर्ज है। चंदन सिंह साल 2015 में आलमनगर विधानसभा क्षेत्र से लोजपा से चुनाव लड़ चुके हैं। इनके खिलाफ पूर्णिया जिले के थाने में केस दर्ज है।
खगड़िया विधानसभा से वर्ष 1990 में जेल से चुनाव लड़कर रणवीर यादव निर्दलीय विधायक बने। वे मुंगेर जिले के चर्चित तौफिर हत्याकांड में जेल में बंद थे। इसके बाद वर्ष 2005 में लोजपा ने उसकी पत्नी पूनम देवी यादव को प्रत्याशी बनाया। जिसमें उसकी पत्नी चुनाव जीतने में सफल रही। कुछ माह बाद ही उसकी पत्नी पूनम देवी यादव ने लोजपा से पाला बदलकर जदयू से विधायक बनी। वही वर्ष 2005 में बेलदौर थाना क्षेत्र के बारुन नरसंहार के आरोपी कुख्यात सहेंद्र शर्मा की पत्नी सुनीता शर्मा को लोजपा ने टिकट दिया। वह भी चुनाव जीतने में सफल रहीं।
कटिहार जिले में हत्याकांड के आरोप में भाजपा एमएलसी अशोक कुमार अग्रवाल और माले विधायक महबूब आलम जेल जा चुके हैं, लेकिन कोर्ट में मामला विचाराधीन है। मुंगेर में 2005 के विधानसभा चुनाव में लोजपा ने हत्या मामले की आरोपी साधना सिंह यादव को जमालपुर विधानसभा क्षेत्र से लोजपा प्रत्याशी बनाया था। लेकिन वे चुनाव में हार गयीं थीं। वर्तमान में तारापुर के वर्तमान विधायक मेवालाल चौधरी पर सबौर कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्ति घोटाला करने का मामला चल रहा है। इसमें वह जमानत पर हैं। वहीं भागलपुर के कहलगांव से विधायक सदानंद सिंह पर विधानसभा अध्यक्ष रहते नियुक्ति घोटाले का केस दर्ज हो चुका है। अध्यक्ष रहते वर्ष 2001 के पहले में विधानसभा में बड़ी संख्या में कर्मचारियों की बहाली हुई थी। इसमें धांधली के आरोप लगे थे। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने केस दर्ज कर मामले की छानबीन की थी। इस केस में सदानंद को हाईकोर्ट से जमानत मिली थी।
बेगूसराय: पंचायत चुनाव के माध्यम से बाहुबलियों ने की राजनीति में इंट्री
जिले में बाहुबली छवि के लोगों का राजनीति में प्रवेश वर्ष 2000 में त्रिस्तरीय पंचायत निकाय के चुनाव से शुरू हुआ। इसके बाद सांसद व विधायक के रूप में भी बाहुबली छवि के लोगों ने राजनीति में प्रवेश करने में सफलता दर्ज की। वर्ष 2000 में जब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव शुरू हुआ तब उस समय बाहुबली छवि के रूप में स्थापित नरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बोगो सिंह तथा रतन सिंह ने जिला परिषद के चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद रतन सिंह  जिला पर्षद अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज होने में सफल रहे। वहीं वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन बलिया संसदीय क्षेत्र से लोजपा ने बाहुबली सूरज सिंह उर्फ सूरजभान को टिकट दिया। सूरजभान ने भाकपा के कद्दावर नेता शत्रुघ्न  प्रसाद सिंह व जदयू के रामजीवन सिंह को चुनाव में पराजित कर दिया। बाद में उन्हें हत्या के एक मामले में सजा भी हुई। वर्ष 2005 के विधान सभा चुनाव में मटिहानी सीट से नरेंद्र कुमार सिंह उर्फ बोगो सिंह ने एनडीए के बागी उम्मीदवार के रूप में ताल ठोकी। उस समय वे भाजपा में थे। भाजपा समर्थक व कार्यकर्ता ने इस आधार पर बोगो सिंह का समर्थन किया कि यह सीट बीजेपी को मिलनी चाहिए थी। बोगो सिंह ने सीपीआई व जदयू के प्रत्याशियों को बड़े अंतर से हराकर यह चुनाव जीत लिया।
बक्सर में नहीं चला बाहुबली का सिक्का
चार विधान सभा क्षेत्रों से बने बक्सर जिले की राजनीति में कभी भी किसी बाहुबली राजनेता का सिक्का नहीं चला है। इस तरह के नेताओं का वर्चस्व यहां के वोटरों ने कभी बनने ही नहीं दिया। वैसे, इस जिले में लोकसभा सीट से कभी भी कोई बाहुबली नेता ने भाग्य नहीं आजमाया है। जबकि, बक्सर के विस क्षेत्र बक्सर, राजपुर, डुमरांव और ब्रह्पुर से लड़नेवाले अधिकतर नेताओं पर अभी भी कई मामले कोर्ट में चल रहे हैं। लेकिन ये मामले संगीन आपराधिक मामले हत्या, अपहरण, रंगदारी से जुड़े हुए नहीं है। ये सभी मामले चुनाव आचार संहिता से संबंधित हैं। वैसे पूर्व एमएलसी हुलास पांडेय और जदयू से डुमरांव के विधायक ददन पहलवान पर सबसे अधिक मामले दर्ज हैं। किसी राजनेता ने अपराध के बल पर राजनीति को बढ़ाया भी नहीं। यहां के लिए ऐसे लोगों को टिकट देने से राजनीतिक दलों ने परहेज भी किया।
गोपालगंज की सियासत में बाहुबलियों का तीन दशकों से प्रभुत्व
गोपालगंज की सियासत में बाहुबलियों का तीन दशकों से प्रभुत्व रहा है। इसमें काली पाण्डेय से लेकर अमरेन्द्र उर्फ पप्पू पाण्डेय और बच्चा चौबे के नाम शूमार हैं। इन लोगों को को बारी-बारी से कई सियासी पार्टियों ने अपनाया। वर्ष 1991 में पूर्व सांसद नगीना राय की हत्या में कटेया के तत्कालीन विधायक बच्चा चौबे ,उनके दो पुत्र व गार्ड को आरोपित किया गया था। बच्चा चौबे 1980 से 90 के दशक में चर्चित रहे। साल 1983 में पटना जंक्शन पर नगीना राय पर बम चलाने के मामले में पूर्व सांसद व गोपालगंज सदर के पूर्व विधायक काली प्रसाद पाण्डेय आरोपित किए गए थे। इसके बाद उनका नाम जिले में बाहुबली के रूप में चर्चित हो गया। काली पाण्डेय ने 1984 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर गोपालगंज से जीत का परचम लहराया था। जेल में रहते हुए उन्होंने चुनाव जीता था। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। वह राजद के टिकट पर भी संसद का चुनाव लड़ चुके हैं। फिलहाल वे लोजपा के प्रदेश महासचिव हैं। कटेया के पूर्व विधायक बच्चा चौबे भी अपने कार्यकाल में दबंग अंदाज के लिए जाने जाते थे। कुचायकोट के वर्तमान जद यू विधायक अमरेन्द्र पाण्डेय उर्फ पप्पू पाण्डेय का नाम भी बाहुबली नेता के रूप में लिया जाता है। हालांकि श्री पाण्डेय का कहना है कि वे समाज की भलाई के लिए राजनीति में हैं। उनका एक विधायक के रूप में ट्रैक रिकार्ड शानदार रहा है। वे हत्या,रंगदारी व अपहरण जैसे संगीन मामलों के आरोपित रहे सतीश पाण्डेय के भाई हैं। पप्पू पाण्डेय पर भी हत्या,रंगदारी जैसे एक दर्जन संगीन मामलों में केस दर्ज हुए थे। पहली बार वह कटेया विधान सभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर चुनाव जीते थे।
जेपी आंदोलन के बाद बाहुबलियों ने यहां की सियासत में इंट्री मारी
कांग्रेस की गढ़ रही सारण की धरती पर 1977 के बाद समाजवादियों ने अपना सिक्का जमाया। जेपी आंदोलन के बाद बाहुबलियों ने यहां की सियासत में इंट्री मारी। मशरक के तत्कालीन विधायक रामदेव सिंह काका की 1970 में हुई हत्या के बाद सारण में नई सियासत का सूत्रपात हुआ। यह सारण में पहली राजनीतिक हत्या थी। इसके बाद दबंग छवि वाले नेता प्रभुनाथ सिंह का उदय हुआ। 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उन्होंने रामदेव काका के विधायक पुत्र डॉ. हरेन्द्र सिंह को शिकस्त देकर विधानसभा पहुंचे। विधायक रहे रामदेव सिंह काका की 1980 में हुई हत्या 15 साल बाद मशरक की ही विधायक रहे अशोक सिंह की पटना में हत्या हुई। निर्दलीय विधायक के तौर पर चुनाव जीतनेवाले प्रभुनाथ सिंह कई बार सांसद भी रहे। सजा के चलते उनकी राजनीतिक विरासत अब बेटे का पास है।  
बाहुबली विधायक धूमल सिंह
बाहुबली मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह अभी सारण के एकमा से जदयू के विधायक हैं। दबंगई के लिए बिहार व झारखंड सहित अन्य कई राज्यों में चर्चित धूमल सिंह ने सारण की सियासत में साल 2000 में इंट्री मारी। तब वह सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक चुने गये। 2005 के फरवरी का चुनाव उन्होंने लोजपा और उसी साल नवम्बर का चुनाव जदयू के सिम्बल पर लड़ा और जीते। फिर उन्होंने अपना क्षेत्र बदल लिया और बतौर जदयू प्रत्याशी एकमा से किस्मत आजमाई।
मढ़ौरा के पूर्व विधायक सुरेन्द्र शर्मा
सुरेन्द्र शर्मा की छवि बाहुबली वाली हैै। उन्होंने 1990 में सियासत में इंट्री मारी और मढ़ौरा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। 1995 का चुनाव आते-आते वे समता पार्टी में चले गये। पार्टी ने उस चुनाव में सिंबल नहीं दिया तो निर्दलीय चुनाव मैदान में फिर से उतरे लेकिन पराजित हो गये। इसके बाद वे हत्या के केस में फंस कर आजीवन कारावास के सजायफ्ता हो गये।
भोजपुर की राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं बाहुबली
आरा। भोजपुर की राजनीति में नक्सली आंदोलनों को खाद-पानी मिलता रहा है तो यहां बाहुबली भी सक्रिय रहे हैं। स्थानीय बाहुबलियों के अलावा बाहरी बाहुबली व आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग भी आरा के चुनावी अखाड़े में अपनी किस्मत आजमाते रहे हैं। वर्ष 1991 के संसदीय चुनाव में पूरे देश की निगाहें भोजपुर पर टिकी थीं। तब शेरे बिहार के नाम से प्रसिद्ध रामलखन सिंह यादव और कोयलांचल के माफिया के रूप में चर्चित सूर्यदेव सिंह के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। 2009 के लोकसभा चुनाव में वैशाली के बाहुबली रामकिशोर सिंह उर्फ रामा सिंह ने यहां से लोजपा के टिकट पर किस्मत आजमायी थी। विधानसभा चुनावों पर गौर करें तो अस्सी के दशक में जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र से दबंग वीरबहादुर सिंह बतौर निर्दलीय चुनाव जीतने में सफल रहे थे।
जेल से ही संदेश विधानसभा चुनाव लड़ा। वीरबहादुर सिंह और तपेश्वर दिग्गज कांग्रेसी नेता तपेश्वर सिंह की लड़ाई में सोनाधारी यादव ने बाजी मार ली थी। वर्ष 2000 में समता पार्टी ने विधानसभा चुनाव में पीरो से बाहुबली नरेंद्र कुमार पांडेय उर्फ सुनील पांडेय को चुनावी अखाड़े में उतारा। वे चुनाव जीतने में सफल रहे। फिर जदयू से भी लगातार चुनाव जीतते रहे। 2015 के चुनाव में राजद-जदयू के बीच महागठबंधन बनने के बाद सामाजिक समीकरण में सुनील पांडेय फिट नहीं बैठे और उन्हें जदयू से किनारा करना पड़ा। सुनील पांडेय की राजनीति में इंट्री के बाद उनके बाहुबली भाई हुलास पांडेय भी जदयू में सक्रिय हुए और त्रिस्तरीय निकाय चुनाव में आरा-बक्सर सीट से विधान परिषद पहुंचने में कामयाब रहे। हालांकि बदली परिस्थितियों में उन्हें भी भाई की तरह जदयू से नाता तोड़ना पड़ा और फिलहाल वे लोजपा में सक्रिय हैं। शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से बाहुबली विशेश्वर ओझा भी भाजपा की राजनीति करते रहे। हालांकि वे चुनाव लड़ने के बावजूद विधानसभा पहुंचने में सफल नहीं रहे। संदेश के राजद विधायक अरुण यादव की छवि भी दबंग की रही है। फिलहाल वे दुष्कर्म के एक मामले में फरार हैं।


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