ख़ारिज हुई दया याचिकायों के एक चक्र के बाद अब दिसंबर 2012 के निर्भया कांड में दोषी सिद्ध हुए मुकेश कुमार, पवन गुप्ता, विनय कुमार शर्मा और अक्षय कुमार को फांसी होना लगभग तय है.
इक्कीसवीं सदी में हिंदुस्तान को झकझोर देने वाला बलात्कार का सबसे ऐतिहासिक मामला अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर बढ़ता सा नज़र आ रहा है, अदालत ने फांसी की तारीख़ 3 मार्च तय कर दी है.
'निर्भया' की कहानी एक ऐसी कहानी है जिसकी स्मृति भारतीय जनमानस के पटल पर आने वाले कई सालों तक ज़िंदा रहेगी. साथ ही, इस घटना के बाद भारतीय क़ानून व्यवस्था में स्त्रियों के पक्ष में आए तमाम बदवालों की वजह से भी ये मामला हमेशा याद दिया जाएगा.
16 दिसंबर 2012 की वो ख़ौफनाक रात
सात साल पहले 12 दिसंबर को 23 वर्षीय निर्भया अपने दोस्त के साथ दिल्ली के साकेत सिलेक्ट सिटी वॉक सिनेमा हॉल में 'लाइफ़ ऑफ़ पाई' फ़िल्म देखने गई थीं. एक कॉल सेंटर में काम करके फिजियोथेरेपी की अपनी पढ़ाई के ख़र्च का इंतज़ाम करने वाली निर्भया उस शाम हर लिहाज से महत्वकांक्षी युवा भारत का प्रतीक थीं.
मेहनती, सपने देखने वाली और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-तोड़ प्रयास करने वाली. हफ़्ते भर के काम के बाद रविवार को दोस्त के साथ फ़िल्म देखने जाने की मोहलत निकलने वाल भारत का एक आम युवा- आपकी-मेरी तरह.
उस शाम जब निर्भया जब अपने मित्र के साथ फ़िल्म देख रही थीं, तब दक्षिण दिल्ली के आरके पुराम इलाक़े की रविदास बस्ती में रहने वाला 31 वर्षीय राम सिंह अपने भाई मुकेश सिंह के साथ अपने रविवार को 'रंगीन' बनाने की योजना बना रहे थे. उसी मोहल्ले में रहने वाले पवन गुप्ता और विनय शर्मा भी इन दोनों भाइयों के साथ शामिल हो गए.
नशे और उन्माद में धुत इन चारों ने आगे बस क्लीनर की तरह काम करने वाले अक्षय ठाकुर और एक नबालिग लड़के को अपने साथ ले लिया.
इधर फ़िल्म ख़त्म होने के बाद निर्भया अपने दोस्त घर वापसी के लिए ऑटो का इंतज़ार करने लगे. काफ़ी देर तक जब द्वारका जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो किसी तरह वो एक ऑटो में बैठकर मुनीरका बस स्टैंड तक आ गए. यहां से भी द्वारका वापसी के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था.
पशोपेश में पड़े निर्भया और उनके दोस्त की नज़र सामने आकर खड़ी हुई एक प्राइवेट बस पर पड़ी. 'द्वारका-द्वारका' की आवाज़ सुनकर दोनों बस में चढ़ गए. उस वक़्त बस में मौजूद लोगों को सहयात्री समझ रहे इन दोनों युवाओं को इस बात का कोई इल्म नहीं था कि उनके सिवा बस में मौजूद 6 आदमी दरअसल अभी-अभी दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती से 'मज़े करने' के उद्देश्य से निकल कर आए हैं.
निर्भया कांडइमेज कॉपीरइटPRAKASH SINGH
रात के तक़रीबन 9.30 बजे मुनीरका से आगे महिलपालपुर के पास पहुँचते ही नबालिग लड़के और उसके साथियों ने दोनों के साथ झड़प शुरू कर दी. कहा-सुनी से शुरू हुए एक मामूली झगड़े के बाद एक घंटे तक जो हुआ - वह एक ऐसा घाव है जो शायद आज़ाद भारत के स्मृतिपटल से कभी नहीं मिट पाएगा.
राम सिंह और उसके साथियों ने एक तरफ़ निर्भया के मित्र के साथ मारपीट की, वहीं दूसरी ओर निर्भया को बस के पीछे ले जाकर मारा-पीटा गया. अपराधियों ने यहीं बारी-बारी से उनका बलात्कार किया. विरोध करने पर लोहे की रॉड पीड़िता के शरीर में डालकर जानलेवा हमले किए गए.
उनके दोस्त को भी मार-मार कर लहुलुहान कर दिया गया. एक घंटे तक चले इस हिंसा के तांडव के दौरान यह सफ़ेद प्राइवेट बस दक्षिण दिल्ली में गोल-गोल चक्कर काटती रही. इसके बाद पीड़ितों को मरा हुआ समझकर उन्हें सड़क के किनारे फेंक दिया गया.
उन्होंने दोनों युवाओं के मोबाइल फ़ोन, पर्स, पैसे, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड छीन लिए. पुलिस को दिए गए बायनों में पीड़ितों ने बताया कि बस से बाहर फेंकने के बाद अपराधियों ने उन्हें बस से कुचल कर उनकी सांसों से साथ सबूत मिटाने की भी आख़िरी कोशिश की थी.
ज़िंदगी के लिए संघर्ष
उधर शाम से गई बेटी का इंतज़ार कर रहे निर्भया के माता-पिता रात दस बजे के बाद से ही उनसे बात करने का प्रयास करते रहे लेकिन फ़ोन लगतार बंद जाता रहा.
रात 11.15 पर निर्भया के पिता को एक फ़ोन आया. फ़ोन पर निर्भया के 'एक्सीडेंट' की सूचना मिलते ही परिवार भागा-भागा सफ़दरजंग अस्पताल पहुंचा जहां पीड़िता जिंदगी और मौत से जूझ रही थी.
घने कोहरे की चादर में ढकी दिल्ली अगली सुबह अपने हालिया इतिहास के बड़े सदमों में से एक के साथ आँखें खोलने वाली थी. मेडिकल जांच के दौरान पता चला कि दोषियों ने लोहे के रॉड के लिए गए हमलों के दौरान पीड़िता के प्राइवट पार्ट्स के साथ साथ उनकी आंत भी बाहर निकला दी थीं.
निर्भया का इलाज कर रहे वरिष्ठ सरकारी डॉक्टरों ने मीडिया को बताया कि उन्होंने अपने पूरे मेडिकल करियर में सामूहिक बलात्कार का इतना वीभत्स मामला नहीं देखा था.
अगले दो हफ़्तों तक निर्भया का मौत के ख़िलाफ़ संघर्ष चलता रहा. लेकिन पूरे शरीर पर मौजूद चोटों और अंतड़ियों के पूरी तरह बाहर निकाले जाने की वजह से उनके ठीक हो पाने की संभावना क्षीण थी. हालाँकि प्राथमिक इलाज के बाद उनके मित्र की अस्पताल से छुट्टी कर दी गई.
निर्भया की हालत ख़राब होते देखकर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने 27 दिसंबर को उन्हें हवाई एंबुलेंस ने सिंगापुर भिजवाने का निर्णय लिया.
महज एक ही दिन के बाद 29 दिसंबर की सुबह निर्भया ने सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया. लेकिन उनकी त्रासद और असमय मृत्यु पूरे देश में महिलाओं पर हो रही हिंसा के ख़िलाफ़ एक ऐसी अलख जगा दी जिसकी रौशनी में आज भी दिल्ली के जंतर मंतर से पटना, हैदराबाद और बंगलुरु तक में होने वाले नारीवादी आंदोलनों में दिखती है.

विरोध प्रदर्शन और जस्टिस वर्मा कमेटी

अब भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में 'निर्भया' के नाम से पहचाने जानी वाली पीड़िता के समर्थन में पूरा देश एक हो गया. दिल्ली समेत भारत के तामाम राज्यों की राजधानियों में मोमबत्तियाँ और प्लेकार्ड पकड़े हुए हुआ 'बलात्कारियों को फाँसी दो', 'लड़की के कपड़े नहीं, अपनी सोच बदलिए' और 'बेटियों के लिए चाहिए सुरक्षा' जैसे नारे लगा रहे थे.
आज़ादी के बाद गहरे शोक और गुस्से में भारत के एक साथ आने का यह दुर्लभ और ऐतिहासिक मौक़ा था. पुलिस के आँसू गैस, डंडों और तेज पानी के इस्तेमाल के बावजूद दिल्ली के इंडिया गेट के सामने प्रदर्शनकारी डटे रहे.
लगातार हफ़्तों चले प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया. जस्टिस वर्मा कमेटी के नाम से पहचानी जाने वाली इस कमेटी का काम महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नए क़ानून बनाने का ज़िम्मा दिया गया था.
निर्भया कांडइमेज कॉपीरइटHINDUSTAN TIMES
स्त्री सुरक्षा के मुद्दे पर देश भर से आए सुझावों के आधार पर महज 29 दिनों में तैयार की गई 630 पन्नों की यह रिपोर्ट बाद में 2013 में पारित किए गए 'क्रिमिनल अमेंडमेंट ऐक्ट' का आधार भी बना. इस नए क़ानून के तहत विशेष मामलों में बलात्कार की सज़ा को सात साल से बढ़ा कर उम्र क़ैद तक किया गया.
साथ ही, मानव तस्करी के साथ साथ यौन हिंसा और एसिड अटैक को लेकर भी नए प्रावधान जोड़े गए.
जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट का एक ओर जहां सभी मुख्य राजनीतिक पार्टियों ने स्वागत किया, वहीं फ़ौज और सुरक्षा बलों द्वारा महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा जैसे विवादस्पद मुद्दों पर साफ़गोई न रखने की वजह से एक वर्ग ने इस रिपोर्ट की निंदा भी की.
पुलिस जांच और गिरफ़्तारियां
दिल्ली पुलिस ने एक हफ़्ते से कम समय में राम सिंह, मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता, अक्षय ठाकुर और एक नबालिग समेत कुल 6 लोगों को पकड़ा. सड़क के पास मौजूद दुकानों से मिले सीसीटीवी से मिले फ़ुटेज के ज़रिए पीड़ितों को ले जाने वाली एक सफ़ेद प्राइवेट बस की पहचान की गई.
पुलिस ने फ़ोरेंसिक सबूतों और पीड़ितों के बायनों के आधार पर एक मज़बूत केस तैयार कर गिरफ़्तारियों के एक हफ़्ते के भीतर ही अदालत में चार्ज शीट फ़ाइल कर दी. पुलिस तहक़ीक़ात के साथ साथ मृत्यु से पहले दिए गए निर्भया के स्पष्ट बयान और इसके बाद अदलात के सामने दिए गए उनके दोस्त के मज़बूत बयानों ने केस को पीड़िता के पक्ष में खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इस बीच मार्च 2013 में मुख्य अभियुक्त राम सिंह की तिहाड़ जेल में मौत हो गई. पुलिस के मुताबिक़ राम सिंह ने आत्महत्या कर ली थी. अगस्त 2013 में नाबालिग अभियुक्त को जुविनाइल कोर्ट ने बलात्कार और हत्या का दोषी घोषित करते हुए 3 साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया.

दोषियों को फांसी की सज़ा

निर्भया के दोषीइमेज कॉपीरइटDELHI POLICE
बाक़ी बचे चार दोषियों - मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और अक्षय ठाकुर- को सितंबर 2013 में दिल्ली की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार, हत्या और सबूत मिटाने के लिए दोषी ठहराया. अदालत के बाहर खड़े प्रदर्शनकारी लगतार दोषियों के लिए फांसी की सज़ा की मांग कर रहे थे.
सज़ा में नरमी बरतने की सारी अर्ज़ियों को ख़ारिज करते हुए निचली अदालत ने चारों को मौत की सज़ा सुनाई. अपराध को 'क्रूर, अमानवीय और देश के सामूहिक अवचेतन को हिला देने वाला' बताते हुए योगेश खन्ना की अदालत ने कहा कि 'वह ऐसे आमनवीय जघन्य अपराधों पर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते'.
हालांकि सितंबर 2013 से अब फ़रवरी 2020 तक यह मामला दिल्ली उच्च न्यायलय और सर्वोच्च न्यायालय से होता हुआ दया याचिकाओं के साथ राष्ट्रपति के दरवाज़े तक हो आया है. लेकिन हर दरवाज़े पर अपराधियों की मृत्यु दंड टालने की अर्ज़ी को सिरे से ख़ारिज ही किया जाता रहा है.
पाँच फ़रवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को अपनी फांसी टालने के लिए दया याचिकाएँ और क़ानूनी अर्ज़ियों के सारे रास्ते इस्तेमाल करने का नोटिस दिया था. लेकिन इस बीच भी उनकी दया की गुहार लगती उनकी सभी याचिकाएँ ख़ारिज कर दी गई हैं.
उधर निर्भया की माँ, आशा देवी भी दोषियों को फांसी देने में हो रही देरी पर लगतार सवाल उठाते हुए यह कह रही हैं कि अपराधी दया याचिकाओं का इस्तेमाल केस को खींचने के लिए कर रहे हैं.
14 फ़रवरी को विनय शर्मा की दया याचिका ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को चारों दोषियों के लिए नए डेथ वारंट जारी करवाने की अनुमति भी दे दी.
दोषियों को फांसी देने के लिए मेरठ से बुलाए गए जल्लाद तिहाड़ जेल पहुँच चुके हैं. नए डेथ वारंट जारी के होने के बाद दोषियों को फांसी पर तो चढ़ा दिया जाएगा, लेकिन अगर बड़े फलक पर देखें तो आज भी देश में यौन हिंसा का शिकार हो रही हज़ारों महिलाएँ न्याय की लंबी और दुरूह लड़ाइयों से जूझ रही हैं.
2018 में 34000 बलात्कार के मामले दर्ज करने वाले इस देश में हर पंद्रह मिनट में एक लड़की यौन हिंसा और बलात्कार का शिकार होती है. यह भयावह आँकड़ा जस्टिस वर्मा कमेटी और निर्भया कांड के न्यायिक नतीजे से आने वाले व्यापक सामाजिक बदलावों की उम्मीद पर बड़े सवाल खड़े करता है.
यह स्थिति तब है, जब आज भी भारत में यौन हिंसा की शिकार दर्जनों महिलाएँ सामाजिक दबाव और पारिवारिक प्रतिष्ठा के भय के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करवा पाती हैं.
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