लालू प्रसाद यादव का शासनकाल बिहार में उद्योगों के बंद होने के लिए जाना जाता है।  चीनी मिल, डालडा फैक्ट्री, सासामुसा पेपर मिल और सासामुसा गत्ता फैक्ट्री। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पूरे राज्य में ऐसी कितनी कम्पनियां बन्द हुई होंगी।
     एक प्रश्न यह हो सकता है कि कम्पनियां बन्द क्यों हुईं! उत्तर बहुत आसान है। एक उदाहरण देखिये। लालूजी की पुत्री की शादी हुई तो पटना में टाटा के शोरूम से सारी गाड़ियां खींच ली गयी थीं। फल यह हुआ कि तब टाटा ने अपनी पटना एजेंसी ही बन्द कर दी।
      उन दिनों लालू जी और उनके लोगों ने हर कम्पनी में अपना शेयर मांगना शुरू कर दिया था। कम्पनी मालिक दो चार लाख रुपये तो दे सकते थे, कम्पनी में शेयर कैसे देते? सो भागने लगे... कम्पनियां बन्द हो गईं, खंडहर बन गईं।
       कल्पना कीजिये, यदि सारी कम्पनियां चल रही होतीं तो क्या इतनी बेरोजगारी होती? कोई कम्पनी केवल उतने ही लोगों को रोजगार नहीं देती जितने लोग उसमें काम करते हैं, बल्कि कम्पनी के अगल बगल  असँख्य लोगों को रोजगार मिलता है। लालू युग में यदि बिहार की सारी कम्पनियां बन्द नहीं हुई होतीं तो बेरोजगारी आधी से भी कम होती।
      फिर आये नीतीश! लालू युग के आतंक से हार चुकी जनता ने नीतीश में अपना तारणहार ढूंढा। वे आये, अपराध पर लगाम लगी, लोग खुश हुए... उस पाँच साल में किसी को याद ही नहीं आया कि रोजगार भी मुद्दा है। लोग इसी में खुश थे कि रोज रोज के हत्या-अपहरण से तो मुक्ति मिली... नीतीश जी भी निश्चिन्त थे, उन्होंने रोजगार के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
      एक कारण और था। नीतीश जानते थे कि बिहार में अब भी रोजगार नहीं, जाति सबसे बड़ा मुद्दा है। वे उसी को साधने में लगे... पंचायत चुनाव में आरक्षण लाया गया, अनुसूचित वर्ग में भी दलित और महादलित के टुकड़े किये गए, अपनी जाति को साधने का प्रयास किया गया। रोजगार तो चर्चा का विषय भी नहीं था।
       नीतीश अपनी इस योजना में सफल रहे। भाजपा के कारण सवर्ण उनके साथ थे, और नीतीश जी ने अपने जातीय गोलबंदी के बल पर गैर यादव obc और sc/st को अपनी ओर मोड़ लिया। विपक्ष में लालू के साथ बचे केवल यादव और मुश्लिम... नीतीश जी की नैया पार होने लगी।
       इन पन्द्रह वर्षों में नीतीश जी ने कभी प्रयास तक नहीं किया कि बिहार में उद्योग धंधे लगें। उन्हें इसकी जरूरत थी ही नहीं। हालांकि उनके शासन में सरकार ने खूब नियुक्तियां की। लगभग तीन लाख शिक्षक, आंगनबाड़ी, टोला सेवक, रोजगार सहायक और जाने क्या क्या... पर उद्योग नहीं लगे। लालू युग में बन्द हुई कम्पनियां चालू नहीं हुईं...
      दोष केवल नीतीश जी का ही नहीं है, सच यह भी है कि आज के पहले बिहार की जनता कभी रोजगार के लिए सरकार के समक्ष मुखर हुई ही नहीं। वोट हर बार केवल और केवल जाति के नाम पर दिया गया, नेता दूसरी ओर सोचे भी कैसे?
       लोगों के सामने रोजगार का प्रश्न था, सो लोग बाहर निकलने लगे और धीरे धीरे दूसरे राज्यों में जाना परम्परा सी हो गयी। बिहार ने इस पलायन को नियति मान कर स्वीकार भी कर लिया।
       एक बात और! धीरे धीरे यह पलायन मजबूरी के साथ साथ शौक भी बन गया। आज की स्थिति यह है कि यदि कोई लड़का बाहर नौकरी न करे तो आसानी से उसका विवाह तक नहीं होता... विवाह के समय लड़की पक्ष की एक अघोषित शर्त होने लगी कि मेरी बेटी गाँव मे नहीं रहेगी। आज भी यही दशा है। बिहार के हजारों लड़के हर साल बाहर केवल इसलिए जाते हैं ताकि विवाह हो जाय। हर गाँव की अनेक स्त्रियां बच्चों को पढ़ाने के नाम पर नजदीकी शहरों में रूम किराए पर ले कर रहती हैं। गाँव छोड़ कर शहर में रहना आवश्यकता नहीं, नशा हो गया है...
      पिछले कुछ दिनों से लोग रोजगार को लेकर मुखर दिख रहे हैं। यह देखना सुखद है... यह नई पीढ़ी शायद कोई नई राह बनाये। जय हो ।जागो बिहारी जागो,प्रवासी मत कहाओ।

#बदलो_बिहार
अब नहीं तो कभी नहीं
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