मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है...
उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है....

वो जो चलते थे,  तो शेर के चलने का होता था गुमान....
उनको भी पाँव उठाने के लिये, सहारे को तरसते देखा है ...

जिनकी नजरों की चमक देख , सहम जाते थे लोग ...
उन्हीं नजरों को बरसात की तरह रोते देखा है.....

जिनके हाथों के जरा से इशारे से, टूट जाते थे पत्थर...
उन्हीं हाथों को पत्तों की तरह , थर थर कांपते देखा है...

जिनकी आवाज से कभी, बिजली के कड़कने का, होता था भ्रम...
उनके होंठो पे भी जबरन, चुप्पी का ताला लगते देखा है ....

ये जवानी, ये ताकत, ये दौलत, सब कुदरत की इनायत है ..
इनके रहते हुए भी इंसानो को, बेजान होते देखा है...

अपने आज पर इतना न इतराना मेरे यारों ...
वक़्त की धाराओं में अच्छे अच्छे को, मजबूर होते देखा है ...

कर सको तो किसी को , खुश करने की कोशिश करो...
क्योंकि, दुःख देते तो हजारों को देखा है ......


प्रदीप कुमार पोद्दार
दलसिंहसराय(बिहार)
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