हमारे देश में शिक्षा की कई परतें हैं और शिक्षा के व्यवसायीकरण की वजह से यह वस्तु बनकर रह गयी है।राज्य के दायित्व वाले क्षेत्र में बाजारवादी ताकतों ने अपना दखल बनाना आरम्भ कर दिया है।आज सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए नए-नए उपाय खोज कर उनका जबरन प्रयोग करवाया जा रहा है।
           सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में सूबे के लगभग 76%बच्चे हैं शेष बच्चे निजी संस्थानों में पढ़ते हैं।कक्षा संचालन की क्रियाविधि दोनों जगहों पर लगभग एक समान ही है।दोनों जगहों पर शिक्षक और छात्र बनी-बनायी सामग्री का उपयोग करते हैं।नकल,शॉर्टकट गेस ,सजेशन ,पैरवी,कॉपी करना या रट्टा मारना यही सफलता दिलाने के तरीकों में शामिल किया जाता है।
वर्ग-कक्ष में बदलाव की बात शायद लोग समझकर भी नहीं समझना चाहते हैं।ऐसे में सबके लिए शिक्षा की बात बेमानी लगती है।
                                 बच्चे नहीं सीखते...प्रतिकूल पाठ्यचर्या और असंगत पाठ्यक्रम की वजह से।नित्य नए-नए प्रयोगों के नाम पर शिक्षा व्यवस्था को जर्जर किया जा रहा है---लेकिन इसके लिए लोग सड़कों पर नारेबाजी,धरना,जाम,प्रदर्शन नहीं करते अलबत्ता मेनू के अनुसार भोजन नहीं मिलने या बंद होने पर लोग आवाज उठाते हैं....सोचना चाहिए कि व्यवस्था ने लोगों को क्या बना दिया है?
                                   इस दुर्व्यवस्था में भी कोई शिक्षक ऊर्जा से भरा हुआ,रचनात्मक कार्यों में लगा है और बच्चों के साथ वह स्वयं भी सीखता है।अपने शिक्षण के दैनिक अनुभवों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करता है साथ ही रोजमर्रा के विकट द्वन्द्वों से जूझते हुए सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के निर्माण हेतु पहल की साझी संस्कृति पैदा करने में लगा है,क्योंकि जब मौसम बिगड़ता है तो गिने-चुने साहसी लोग ही घर से बाहर निकलते हैं बिजलियों की गरज और बारिश की बौछारों से बेखबर।ऐसे लोग जो बाढ़ के खिलाफ बांध की तरह बिछ जाने को आतुर हों...
                                         प्रयोगधर्मी,स्वतंत्र विचार,बदलाव के हिमायती और खुले दिमाग वाले अभिभावकों और शिक्षकों के संयुक्त प्रयास से ही सूबे का वर्तमान और भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
क्रमश: ....... .......
                                  पल्लवी कुमारी 
Share To:

Post A Comment: