प्रत्येक व्यक्ति सोचने-विचारने में निर्बाध रूप से स्वतंत्र है.लेकिन बोलने में व्यक्ति की शक्ति सीमित है क्योंकि बोलना हमारे बाह्य व्यक्तित्व,भाव-भंगिमा को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है.हम जो कुछ भी बोलते हैं उससे उस भाव-विचार-बोल को सुनने वाला हर्षित हो सकता है,रुष्ट हो सकता है,असहमत हो सकता है,प्रतिक्रियास्वरूप उससे भी अधिक कठोर वचन बोल सकता है,झंझट खड़ा कर सकता है.ऐसा अनिष्ट कर सकता है जिसकी क्षतिपूर्ति कर पाना भी संभव न हो.इन्हीं आशंकाओं-संभावनाओं के चलते विचारशील-विचारवान व्यक्ति कुछ भी बोलने से पहले सोचते हैं.विचार करते हैं.वाणी पर नियंत्रण रखते हैं.यही व्यक्ति विशेष का दिखाई देनेवाला सद्गुण बन जाता है.लेकिन भावनाओं पर व्यक्ति की यह आधी-अधूरी विजय है.
              पूर्ण विजय तो तब है जब व्यक्ति किसी को अप्रिय लगनेवाले बोल,किसी का अनिष्ट करने वाले बोल,किसी की भावनाओं को आहत करने वाले बोल सोचे भी नहीं.जब कही हुई बात व्यक्ति का स्वयं का और सुननेवाले दोनों का अहित कर सकती है तो ऐसी बात सोचने मात्र से भी दोनों का अहित सुनिश्चित है.
चूँकि हमारे मन-वाणी व कर्म तीनों ही अन्तर्सम्बन्धित है.यथा विचार तथा भाषा,यथा भाषा तथा क्रिया साथ ही जैसी भावनाएं होंगी वैसे ही विचार भी आएंगे इसलिए "जो बोलने योग्य नहीं है,वह सोचने योग्य भी नहीं है"
यदि किसी कारण से मन में नकारात्मक भाव आएं तो तत्काल शुभ भावों को आमंत्रित कर होशपूर्वक मन को सकारात्मक सुझाव दें.मन ही मन कहें
                                                         "सबका शुभ हो"
                                                        सबका सुमंगल हो
                                                       सबका कल्याण हो"
स्वयं के विचारों के नकारात्मक प्रवाह को सजगता पूर्वक विसर्जित कर सबके लिए मंगल और कल्याण की कामना से शुभ भावों को भरते जाने से सबका कल्याण होगा ही. ...सत्य है...सत्य है...सत्य है
                
नोट:-  होश साधना ,पल-पल सतर्क प्रतिसंवेदन और जागरुकता या दूसरे शब्दों में कहें तो साक्षी भाव को उपलब्ध होना वास्तव में कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं।यह प्रत्येक के लिए संभव हो सकता है लेकिन आत्मनिरीक्षण और आत्म चिंतन की निरंतरता के साथ ध्यान का आश्रय आवश्यक है...मायिक प्रपंचों में उलझे मन के लिए ऐसा कर पाना दुरूह प्रतीत होता है क्योंकि मन का नियम है कि यह हमेशा आसान लगने वाले कार्यों की तरफ सहज मुड़ जाता है जबकि कठिन रास्तों पर इसे प्रयत्न पूर्वक ही ले जाया जा सकता है।पहले मन को ही साध कर अपने अनुकूल करना पड़ता है फिर साधे हुए मन को आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रवृत्त कर अंतर्यात्रा निर्बाध जारी रहती है।
असल में मन जिससे बचना चाहता है उसके लिए युक्ति युक्त तर्क भी ढूंढ लेता है...ये मन की चालाकी है श्रम करने से बचने की।
"लुढकना हमेशा आसान होता है चढ़ना कठिन"
अगर कुछ छूट रहा हो तो यही समझ लें कि अनुभूति की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त शब्द नहीं मिल सका...इस संबंध में प्रत्येक की अलग-अलग अनुभूति हो सकती है और कुछ चीजें स्वयं के अनुभव से ही जानी जा सकती हैं। ...आपके सुधारात्मक सुझाव की प्रतीक्षा में हूँ ...निशि नमन।।
©मनीष
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