आत्महत्या और हमारा समाज

सुशांत सिंह की घटना त्रासद है। उनकी मृत्यु ने मुझे आहत किया है। हत्या हो या आत्महत्या किसी भी रूप में मृत्यु सदैव आहत करने वाली ही होती है। एक ऐसे सफल नौजवान की यूँ रुखसती हृदय हिला देने वाली खबर है। फिर ऐसे अंजाम को हासिल करने वाले लोगों की संख्या भी एक नहीं, अनगिनत है। उनमें से बहुत खबरों में आ पाते हैं और बहुतों की फाइलें समय के गर्भ में हमेशा के लिए दफ़न हो जाती हैं। इस समय अपनी और अपने समाज की रक्षा के लिए सुशांत सिंह के मामले ने आत्महत्या को एक अपरिहार्य विमर्श का विषय अवश्य बना दिया है। 

'पीके' छोड़कर मैंने उनका और कोई काम नहीं देखा। इसलिए नहीं कह सकता कि वे कलाकार कैसे थे लेकिन खबरों ने इतना जरूर जतला दिया है कि नाम, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और पैसे में वे किसी तरह कम नहीं थे। फिर ऐसी कठोर घटना? कुछ तो कमी रही होगी। मैं जो कहना चाह रहा हूँ, उसमें सुशांत उतने महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण हैं वे कारण जिनके वश में आकर उनकी उनपर ही कुछ चल न पाई। वे खुद से ही हार गए।

एक बात मगर निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि आत्महत्या कोई अचानक घटित होने वाली घटना नहीं वरन एक घुटन भरी धीमी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम है। संघर्ष झेलते-झेलते जब व्यक्ति की ताकत जवाब देने लगती है, उसके हरेक उपाय विफल हो जाते हैं, उसके अंतर की घुप्प अँधेरी गुहा में रोशनी की कोई किरण कहीं से नहीं झाँकती, तभी और केवल तभी कोई यह विकल्प चुनता है। आत्महत्या का विकल्प दुस्सह वेदना में डूबे हुए निराश मन का आखिरी तिनका है। हताशा की आखिरी अवस्था आत्महत्या की प्रेरणा के लिए ठोस संकल्प जुटाती है। और फिर उतना ही बल शेष रह जाता है जितने में अपने प्राणों से छुट्टी ली जा सके। 

एक संख्या है इस दुनिया में उनकी जो थक-हारकर आत्महत्या के विकल्प का चयन करते हैं। दूसरे इसे चाहे जिस नजरिये से देखें, वास्तव में यह पलायन नहीं है। दुःख से पार पाने के संघर्ष में लगने वाले आत्मबल की यह अंतिम आहुति है। आत्महत्या व्यक्ति का संसार के प्रति अंतिम रण है।

यह अलग बात है कि संसार की दृष्टि में आत्महत्या शोभन नहीं। शोभन तो यह आत्महंता की दृष्टि में भी नहीं होता होगा लेकिन जब बात जीवन के प्रति प्रेम और जीवन में शांति, स्थिरता और सुख के तलाश की उठे तो एक शांतिपूर्ण, प्रेमपूर्ण, सफल और सम्मानित जीवन के लिए अन्य कोई उपाय अपने सामने नहीं पाकर व्यक्ति वह जोखिम भरा अंतिम कदम उठाता है जिसमें यह जीवन जो उसकी दृष्टि में अब और अधिक जीने लायक नहीं बच गया हो, उसे तिलांजलि देकर अज्ञात भविष्य में छुपे रहस्य जैसे किसी अपर जीवन की आस में लंबी छलाँग लगाता है जिसके बाद हारता भी वही है और जीतता भी वही है। वह हार जीवन से और वह जीत जीवन पर होती है।

अँधेरे से लड़ते हुए इस अंतिम समर में योद्धा अकेला होता है। शांति और सुख की आशा में वह स्वयं ही स्वयं का विजेता और स्वयं ही स्वयं से पराजित होता है। आत्महत्या कोई शौक की चीज नहीं। यह तो तभी सम्भव है जब वर्तमान जीवन में कोई अर्थ या कोई प्रयोजन नहीं रह गया हो।

आत्महत्या जीवन को दाँव पर लगाता है। जीवन जब इतना नरक जैसा हो जाए कि उसे जीना मृत्यु के कष्ट से भी अधिक कष्टकारी प्रतीत होने लगे, तब वैसी ही स्थिति में कोई व्यक्ति स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करता होगा। शायद एक उम्मीद कि जो जीवन से न मिल सका, क्या पता मृत्यु से मिल जाए और यदि मृत्यु भी शांति का वह सुख नहीं दे सके तो नहीं सही, कम से कम इस नरक से तो उबार सकेगी। बाहरी परिस्थितियों से हारकर इस पार जब सब शून्य हो चुका हो तो ही कोई आदमी उस पार के महाशून्य में अपनी मर्जी से कूदता होगा। शायद एक आस कि कुछ नहीं तो कम से कम निर्द्वन्द्व तो हो सकेगा!

मृत्यु के बाद संसार संवेदना व्यक्त करके अपना दायित्व निभा देता है किन्तु प्रायः जीवन पर्यंत वह वेदना देने का काम ही करता रहता है। इसी सबको देखते हुए बुद्ध ने कहा होगा कि जीवन दुःख है। जीवन दुःख है लेकिन संसार और समाज अगर स्वस्थ हो तो जीवन का दुःख थोड़ा कम जरूर हो जाय। जीवन दुःख है लेकिन जीवन में सुख के फूल भी कम नहीं। ये अलग बात है कि सुख में मस्त होकर आदमी अपने दुखों को भूल जाता है। फिर जब अपने दुखों से उसका सामना होता है तो उसे वे इतने भारी लगते हैं कि वह जीवन से मिले अन्य सुखों को भूल जाता है।

यह भी मनुष्य के गुणों में सम्मिलित है कि वह अपने दुख को सबसे बड़ा मानता है और यह बात भूल जाता है कि दुख सबके पास हैं और हर कोई उन्हें सबसे बड़ा मानकर चल रहा है। अपने दुखों का भारी बोझ लादे हुए मनुष्य जीवन में जब अकेले बढ़ता है तो उस क्लांत पथिक को तनिक भी सहारा देने वाला कोई तो दूसरा मुसाफिर सामने आए। वह दूसरा मुसाफिर इसी दुनिया और इसी समाज से निकलकर आ सकता है जिसमें खुदगर्जी की शराब पिये लोग किसी का साथ केवल तभी तक दे पाने के आदी हो चुके होते हैं जब तक कि उनका अपना स्वार्थ सिद्ध होता हो। अपने-पराए से शुरू होकर हमारी दुनियावी शिक्षा हमें इतना अधिक आत्मकेंद्रित कर देती है कि हम दूसरों के दुख बाँटने की कला ही नहीं सीख पाते। 

हमारा समाज विभिन्न संकुचित इकाइयों का एक औपचारिक जोड़ मात्र बनकर रह गया है। हमने अपने को अपने तक ही सीमित कर रखा है। परिवेश के प्रति हम प्रेम और मैत्री से भरे हुए नहीं रह पाए। कृत्रिमता ने इतना जोर पकड़ रखा है कि हमारे हृदय में सहज और स्वाभाविक रूप से स्नेह, सद्भाव, सौमनस्य और सख्य के सुंदर फूल खिलने बन्द हो चुके हैं और यदि हमने उन्हें कहीं किसी कोने-कातर में बचा भी रखा है तो उनकी सुवास सिर्फ हम या चंद "हमारे" तक ही होती है। हमने अपनी उपलब्धता खो दी है। अपनी सामाजिकता को हमने अपनी निजी जरूरतों तक ही सीमित कर लिया है। हमारा समाज महज एक औपचारिक संस्था बनकर रह गया है जिसका उपयोग हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन के तौर पर ही करते रहते हैं। 

आवश्यकता है एक ऐसे समाज की जो व्यक्ति का व्यक्ति से हार्दिक मेल कराता हो। टटोलकर देखें तो हमारा अनुभव हमसे यह चीख-चीखकर कहता नजर आएगा कि खून के रिश्तों से ज्यादा खुशियाँ और ज्यादा सहारे तो उन रिश्तों ने हमें दिए हैं जिन्हें हमारे साहचर्य ने निर्मित किया है और जो खून के रिश्ते नहीं हैं। परिवार भी हमारा केंद्रीकृत हो चुका है। फ्लैटों में जीवन बसर करने वाले नाभिकीय परिवार क्या जानें उस रस को जो प्रेम और आत्मीयता से भरे पुराने समाजों में मिला करता था। हम तो उसे अब रिटार्डेड लाइफस्टाइल कहने लगे हैं। इमोशनल फूल्स कहलाने लगे हैं वे जो दूसरों के दुख-दर्द बाँटा करते हैं।

हम आधुनिक और व्यावसायिक हो गए हैं। मतलब से मतलब रखते हैं। मतलब खतम हो जाए, फिर हम अपने बाप से भी मतलब नहीं रखते। हृदय कहीं दूर पीछे छूट गया है और बुद्धि ने सारा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए जिए" जैसे वाक्य अर्थहीन हो गए हैं। अपने परिवेश से टूटे हुए हम बड़ी स्पीड में हैं। हमारे पास समय नहीं है। हमें बहुत कुछ करना है लेकिन जो कुछ करना है, वह सब कुछ हमें सिर्फ अपने लिए करना है। हम समझते हैं कि ऐसे हम खुद को बचा लेंगे। अफसोस कि अक्सर सभी यही सोचते हैं और साथ रहते हुए भी अलग-थलग पड़ जाते हैं। ऐसी अवस्था में क्या पता कि हममें से कौन कब रसहीन होकर गिर पड़े। हममें से ही कोई दूसरा आगे सुशांत की गति को न उपलब्ध हो जाये, इसलिए जरूरी है कि अपने समाज की जड़ों में प्रेम और सहानुभूति का रस घोलें। सामाजिक बेहतरी हमारी अपनी सुरक्षा और हमारे अपने विकास के लिए भी निहायत जरूरी है।
© मणिभूषण सिंह
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