"सत्य मेव जयते, जय मां भारती"
समाज का चीर हरण:- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसकी आवश्यकता की पूर्ति समाज से ही होती है, परंतु आज मनुष्य के द्वारा ही समाज का चीर हरण क्यों किया जा रहा है? यदि इस इस विषय वस्तु पर विचार विमर्श किया जाए तो इसमें सरकार की अहम भूमिका है, हमें संज्ञान है कि समाज का निर्माण कर्ता दूसरा कोई नहीं मनुष्य ही हैं, मनुष्यऔर समाज एक दूसरे के पूरक हैं। परन्तु सवाल है कि आज कि स्थिति नाजुक क्यों? हमारे राष्ट्र में जब की धर्म निरपेक्ष स्वच्छ लोकतंत्र के पुख्ता दस्तावेजों को स्थापित किया गया है। इसमें कहीं दोष नहीं है, हां है भी तो इसके उपयोगिता में निहित है क्योंकि आज के समय में इसे सस्पेंड करने को बदलाव समझा जा रहा है। चाहे वे अनौपचारिक हो या औपचारिक हो। यहां अब प्रश्न यह उठता है वर्तमान समय में "राजनीति" को हेय दृष्टि से क्यों देखा जा रहा है? "राजनीति" का तो तात्पर्य है कि राज्य एवं राष्ट्र में सुव्यवस्थित सुशासन स्थापित कर जनता में सद्भावना, सद्विचार एवं सौहार्द को फैलाना लेकिन यहां पारा शूटर पर कुछ और ही अंकित है तथा ग्रास शूटर पर कुछ और ही दिख रहा है तो जनता किसे सत्य माने, वह संदेह में पड़ी हुई है। जनता यदि राजनीति से परे हट कर "कूटनीति" पर नजर दौड़ती है तो वहां भी नीति नेता के प्रकोष्ठ में विलुप्त है और सिर्फ बचा है तो क्या केवल "कूट"यहां भी जनता की गाड़ी फंस जाती। आखिर समझ नहीं आता जनता करे तो क्या करे?
इधर राज एवं राष्ट्र नेता जनता में संज्ञान देते हैं कि जाति प्रथा खत्म करो और जनता जब उनके कार्यालय में जाती है तो आदेश करते हैं कि जाति प्रमाण पत्र जमा करो, तो स्पष्ट हम जानना चाहते हैं कि जाति एवं धर्म में बिखराव कौन फैला रहा है? आज आरक्षण रूपी दानव शिक्षा रूपी देवी का साक्षात् भक्षण करते जा रहा है इस पर किसी का नजर नहीं है क्यों? हम मानते हैं कि भारत गरीबों का राष्ट्र है लेकिन नेता जी लोग इन लोगों की स्थिति को सुधार कर सामान्य श्रेणी में क्यों नहीं ला रहे हैं? और आरक्षण को संविधान के अनुच्छेद से सस्पेंड क्यों नहीं कर रहे हैं? इसका कारण एक ही है कुर्सी!
जिस दिन हमारे राष्ट्र में विज्ञान जीवित और विज्ञापन की मृत्यु हो जाए उसी दिन हमारा राष्ट्र विकासशील नहीं बल्कि विकसित हो जाएगा।
हम लोकतंत्र का तहेदिल से सम्मान करते हैं परन्तु अरस्तू एक महान मार्गदर्शक एवं दार्शनिक थे उनके मत के अनुसार लोकतंत्र आठ भागों में विभाजित है:-1. लोक तंत्र 2. प्रजा तंत्र 3. मूर्ख तंत्र 4. भूखमरी तंत्र 5. विकृत तंत्र या जुबान बंदी तंत्र 6. निष्क्रिय तंत्र 7. विघटनकारी तंत्र 8. नर संहार तंत्र।।
प्रिय भारत एवं बिहार वासियों अब आप चिंता नहीं बल्कि चिंतन कीजिए कि उपरोक्त आठ तंत्रों में से आज वर्तमान में किस लोकतंत्र का उपयोग किया जा रहा है। इस निलेख का मंथन कीजिएगा तो समुद्र से तो चौबीस रत्न प्राप्त हुए थे परन्तु इसमें से चौबीस लाख रत्न प्राप्त होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। (सत्य मेव जयते)
किसान समाज पार्टी (एस)
बिहार प्रदेश प्रवक्ता
दीपक ओझा
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