राम मंदिर आंदोलन का इससे अधिक तार्किक क्लाइमेक्स हो भी नहीं सकता था। जब अस्पताल के बिना सड़कों पर तड़प-तड़प कर मरने वालों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है, तब हमारे प्रधानमंत्री 'भव्य' राम मंदिर का शिलान्यास करेंगे। अब वे भी क्या करें, सुना है ऐसा स्वर्णिम मुहूर्त्त 500 वर्षों के बाद आया है। इस मुहूर्त्त को खाली जाने भी दें तो कैसे!

    योगी ने आह्वान किया है कि शिलान्यास के दिन यूपी में दीवाली मनाई जाए। जाहिर है, लोग इस आह्वान को सिर माथे लेंगे। 

    वैसे तो दुनिया के तमाम 'रामभक्तों' का आह्वान किया गया है कि वे उस दिन दीप जलाएं। हमें उस दिन न्यूज चैनलों पर सजी हुई दीप मालाएं देखने का सौभाग्य मिलेगा, उत्साहित एंकरों की उल्लासपूर्ण कमेंट्री सुनने को मिलेगी..."जैसा कि आप देख रहे हैं, तमाम चौक-चौराहों पर, घरों की छतों पर, मुंडेरों पर, बॉलकनियों पर दीप सजे हैं...इनके दिव्य प्रकाश में माहौल की कालिमा तिरोहित हो रही है...लोगों के चेहरों पर उल्लास है, मन में उमंग है...आदि आदि।

   हमें कोई संदेह नहीं कि उस दिन बहुत सारी महिलाएं अच्छी-अच्छी साड़ियां पहन कर, सज धज कर गोल घेरे में सामूहिक नृत्य करेंगी, राम लला के जन्म की खुशी में गीत गाएंगी। टीवी वाले कैमरों को जूम कर हमें उनके खुशी से दमकते चेहरे दिखाएंगे, नृत्य की विभिन्न भंगिमाएं दिखाएंगे।

       इतिहास भी कैसे-किसे विरोधाभासी दृश्य प्रस्तुत करता है। बेड की कमी से अस्पतालों की देहरी पर, सड़कों पर मरते लोग, मंदिर के शिलान्यास की खुशी में नाचते, दीवाली मनाते लोग।
 
    दोनों दृश्य एक साथ...।

अब आपकी मर्जी, आपकी सुविधा, आपकी रुचि, आपका मनोविज्ञान...आप व्यवस्था की नाकामी से मरते हुए लोगों के प्रति वेदना महसूस करें या निर्माणाधीन मंदिर की संभावित भव्यता पर मुग्ध हो कर मगन हो जाएं।

   हमारे गांव में भी उस दिन दीप जलेंगे। शायद...कुछ अति उत्साही लोग पटाखे और आतिशबाजी का भी इंतजाम करेंगे। लॉक डाउन के बावजूद कुछ दुकानदार आतिशबाजियों की सामग्री जरूर लाएंगे कहीं से। बिजनेस मैन ग्राहकों की संभावित मांग को सूंघ जो लेता है।

  वैसे, अब तक कोरोना से बचा हमारा गांव अब इसकी जद में आ गया है। दो-तीन पहले एक संक्रमित का पता चला। दो दिन बीतते संख्या चार हो गई। सुना, 15-20 लोग लक्षणों के शिकार हैं लेकिन  उनकी जांच कब होगी, रिपोर्ट कब आएगी, नहीं पता।

   तो...मेरे गांव में, जो अनुमंडल मुख्यालय है, कोरोना मैया का प्रकोप शुरू हो गया है। यहां का अनुमंडल अस्पताल, जिसकी बिल्डिंग तो बरसों पहले बन गई, लेकिन बस बिल्डिंग ही रह गई, अब खंडहर बनने की राह पर है। टहलते कुत्तों और चरती बकरियों के साथ वीरान कैम्पस। 

    बिहार के अस्पतालों की बदहाली अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बन गई है। 

  नहीं, पटना से छपने वाले हिन्दी अखबारों में नहीं। उन्हें अस्पतालों से क्या मतलब? बिहार के अस्पतालों और यहां के मरीजों की दुर्दशा बीबीसी पर रिपोर्ट कर रहा है, सीएनएन रिपोर्ट कर रहा है, स्वतंत्र पत्रकारिता की लौ जलाने वाले कुछ यूट्यूब चैनल रिपोर्ट कर रहे हैं...निस्संदेह, एकाध टीवी चैनल भी।

  यूपी में हालात बिहार से बहुत बेहतर नहीं होंगे।

 लेकिन...अब योगी जी ने दीवाली मनाने को कहा है तो मनाई जाएगी। शायद, शिलान्यास के दिन की सबसे भव्य दीवाली यूपी की ही हो। आखिर, उन्होंने उमग उमग कर इसी दिन के लिये तो वोट डाले थे।

     बचपन से, जब से बोलना सीखा, किसी भी दुःख-तकलीफ में मेरी मां कहती थी, "सीताराम सीताराम बोलो...भगवान कष्ट हरेंगे।"
मन में बैठ गई बात। आज तक बैठी है। कोई भी तकलीफ होती है, जब कभी खुद को असहाय, निरुपाय महसूस करता हूँ, सीताराम, सीताराम का जप मन ही मन करता हूँ। मन के इस विश्वास के साथ कि...सुना है, कलियुग में भगवन्नाम का स्मरण ही कष्टों से मुक्ति के द्वार खोल देता है।

  लेकिन, राजनीति और राम के इस अजीब घालमेल से हमेशा व्यथित महसूस किया खुद को। 

   खबरों में पढ़ा...,कल पटना के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में कार्यरत एक डॉक्टर की पत्नी को तमाम कोशिशों के बावजूद किसी भी अस्पताल में एडमिट नहीं कराया जा सका और उसने सड़क पर ही दम तोड़ दिया। 

       विरोधाभासों से भरा समय है यह। हमारी पीढ़ी समय की चुनौतियों की पदचाप नहीं पहचान सकी। आज संकट सिर पर है। व्यवस्था ध्वस्त है और सर्वत्र अंधेरा पसरता जा रहा है। 

 त्रासदी यह...कि अंधेरों के सौदागर दीप मालाएं सजाने के लिये हमारा आह्वान कर रहे हैं। 
   और...हम सजाएंगे, नाचेंगे। *मृत्यु के पसरते अंधेरों में रुग्ण मानसिकताओं का नग्न नर्त्तन।*
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