आज एक कहानी प्रस्तुत करने का विचार था...कहानी आपके सामने है...कृपया पढ़कर अपने अनमोल सुझाव अवश्य देंगे...

दायित्व-बोध
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"आज फिर वागीश को विद्यालय पहुँचने में देर हो गयी।"
न चाहते हुए भी अक्सर उन्हें देर हो जाती है और इस एक कमजोरी की वजह से उनका मन अपने आप से क्षुब्ध रहता है।
अनेकानेक विषम विचारों से लड़ते-भागते,सोचते-विचारते,
हाँफते हुए विद्यालय के प्रवेश द्वार पर थोड़ा रुककर
प्रधानाध्यापक और बाकी सहकर्मियों की चुभती नजरों से बचते-बचाते जैसे ही विद्यालय प्रांगण में उन्होंने प्रवेश किया कि अचानक कुछ बच्चे उनकी तरफ ..."वागीश सर"....."वागीश सर" कहते दौड़ पड़े।
सर जी""
परवेज बहुत देर से रो रहा है,छज्जे पर से कूद गया और हाथ पकड़ कर रो रहा है।कुछ बोलता भी नहीं।
एक बच्चे ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा।
"कहाँ है परवेज?क्या हुआ उसको?"
दूसरे बच्चे ने कहा..."सर उसका हाथ फूला हुआ है, वो आधे घण्टे से रोए जा रहा है।हमलोग हेड सर को बताने गए तो सुजीत सर हमलोगों को डांटकर भगा दिए।
वागीश ने एक नजर अपनी कलाई घड़ी पर डाली ...साढ़े नौ बजने ही वाले थे।फिर वे तेजी से उस तरफ ऊपर के दोमंजिले भवन की ओर दौड़े..
ऊपर तीसरी कक्षा में एक बच्चा सुबक-सुबक कर रो रहा था।
कुछ बच्चे उसे घेरे हुए थे और अपने-अपने तरीके से हौसला देने का प्रयास कर रहे थे।
"परवेज क्या हुआ...अरे इसका हाथ तो बहुत फूल गया है"
आओ मेरे साथ..
बच्चा और जोर से रोने लगा और वागीश की तरफ कातर नजरों से देखने लगा।नीचे उतरते हुए सारे बच्चे दौड़कर प्रधानाध्यापक कार्यालय के सामने जा खड़े हुए।
शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक बाहर आए और वागीश पर नजर पड़ते ही शुरू हो गए।
आपको कितना भी कहें आप अपना ढर्रा नहीं बदल पा रहे।ऐसे कैसे चलेगा?जिम्मेदारी तो समझते ही नहीं आप..!
चूँकि वागीश जी हाल ही में अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर विद्यालय में आए हैं और बाकी सभी सहकर्मियों से उम्र और ओहदे में भी छोटे हैं इसलिए सबका हमेशा आदर किया करते हैं।अक्सर उन्हें अपनी विनम्रता का मूल्य भी चुकाना पड़ता है।
...क्या हुआ?कुछ बताएँगे आप?
प्रधान जी की तेज आवाज से उनकी घबराहट बढ़ गयी।
...सर....सर बच्चे का हाथ टूट गया है।
"आंय..?किसका हाथ टूट गया?एक तो आप पहले ही लेट आए हैं ऊपर से फिर एक बहाना!ई लोग कुछ सुनता है?जब तक घण्टी नहीं बजती दिमाग खराब करके रख देता है।
हम अकेले कहाँ-कहाँ दौड़ते रहें!
आना है नौ बजे आएँगे तेरह बजे...
सर और लोग भी तो हैं फिर अकेले आप... ...
....आप अपनी जिम्मेदारी लीजिए न..और लोगों से आपको क्या मतलब है?झल्लाते हुए प्रधान जी ने कहा!
सर!इस बच्चे का हाथ देखिए वागीश ने बच्चे को उनके सामने लाते हुए कहा।
प्रधानाध्यापक अनमने भाव से देखते हुए बोले..जाइये इसको इसके घर पहुंचाकर तेजी से आइये।लेट मत कीजिए।
वागीश ने बच्चे को साइकिल पर बैठाया और अंगोछे से उसका हाथ लपेट कर गर्दन के ऊपर बांध दिया..फिर पीछे मुड़े..
तभी प्रधान जी फिर गरजे... अब जाइये भी
पीछे कार्यालय से तबतक और शिक्षक-शिक्षिकाएं बाहर निकल कर देख रहे थे।वागीश बच्चे को संभालते हुए चले...पीछे से सुजीत सर भी मोटरसाइकिल से निकले और फुर्र से आगे निकल गए।
बच्चे के घर पर कोई नहीं था।उसकी माँ कहीं किसी के खेत में घास छीलने गयी थी।कुछ देर में बच्चे की माँ भागती हुई घर पहुँची, बच्चे को देखा तो रो पड़ी और रोते-रोते कहने लगी...."एक्कर अब्बा बाहर रहै छै...हम अकेले की सब करियै?आब हम की करबै?ई की कैर लेलहीं रे बेटा...
वागीश ने कहा आप रोएँ नहीं...
मैं चलता हूँ बच्चे को लेकर, आप मेरे साथ आएँ...
...सर जी ...हमरा एक्को पैसा नै छै...केना इलाज करैबै...कत्ते मुश्किल स त एकरा सब क फरमाइश पुरबैत रहै छियै...
कोई बात नहीं...मैं हूँ न!बच्चा मेरा भी तो है!
वागीश ने बच्चे और उसकी माँ को साइकिल पर बैठाया और तीन किलोमीटर दूर एक प्राइवेट क्लीनिक पहुँचे।
बच्चे की उचित प्राथमिक चिकित्सा बैंडेज-प्लास्टर आदि करवाते हुए उसे कुछ फल,बिस्किट आदि खरीदकर दिया और उसकी माँ को दवाइयों का पैकेट देते हुए आवश्यक सुझाव देकर वापस विद्यालय की तरफ चल पड़े।
बच्चे की माँ ने पीछे से आवाज दी....
सर जी..
...जी""
कत्ते पैसा लगल?
कुछ सकुचाते हुए वागीश ने कहा..
...सोलह सौ""
....सर जी एत्ते पैसा त हमरा पास नै छै
एक्कर अब्बा भेजत न त सब पैसा धीरे-धीरे दै देब
...कोनो बात नै छै
हम अपनेक माँगलौं नै न
....नै सर जी...अपने नै माँगलियै लेकिन हम्मर की फर्ज बनै छै...अपनहुँ त केकरो स लेबे न कैलियै...****
असल में वागीश के पास भी उस दिन मात्र दस रुपये ही थे..
लेकिन बच्चे का इलाज बहुत जरूरी था,बच्चा दर्द से बेहाल था और बहुत रो रहा था।डॉक्टर के पास पहुँचते ही उन्होंने धीरे से पूछा कि डॉक्टर साहब कितने पैसे लगेंगे?
डॉक्टर ने कहा कि करीब दो हजार तो लग ही जाएँगे...
दो एक्सरे करना होगा..हड्डी टूटी है तो प्लास्टर और बैंडेज के साथ-साथ कम से कम महीने भर की दवाई और इंजेक्शन वगैरह तो जरूरी ही होगा।
वागीश कुछ देर खड़े सोचते रहे और डॉक्टर से कहा कि आप इलाज कीजिए...मैं आपको पैसे एक दो दिन में वेतन मिलते ही दे दूँगा।
डॉक्टर ने चुटकी लेते हुए कहा कि क्या सर अभी कुछ दिन पहले ही तो अखबार में नियोजित शिक्षकों के वेतन के बारे में आया था...आप भी न शिक्षक होके झूठ बोलते हैं।
आश्चर्य मिश्रित भाव से डॉक्टर की ओर देखते हुए वागीश मन ही मन सोच रहे थे...
इन्हें कैसे समझाऊं कि अखबार में आने के बाद राशि खाते तक पहुंचने में लगभग पंद्रह-बीस दिन लगते हैं।कभी कभी तो महीनों लग जाते हैं।
सर जी को चुप देख डॉक्टर ने कहा ...देखिए मैं समझ सकता हूँ लेकिन बच्चे का ट्रीटमेंट भी तो जरूरी है।
मैं तब तक एक्सरे वगैरह करता हूँ,आप घर से हो आइये।
कुछ सोचते हुए वागीश चल पड़े और एक मित्र के पास पहुँचकर सारी व्यथा-कथा बताई।
मित्र ने तुरंत यह कहते हुए पैसे दे दिए कि अरे मित्र हैं आप हमारे...और आपका तो अभी भी मेरे पास तीन हजार बच रहा है।मैं तो पिछले तीन माह से आपके आने की प्रतीक्षा कर रहा था।ये तो अच्छी बात है कि आप इसे एक नेक कार्य में लगा रहे हैं।अगर मेरे पास पैसे न भी होते तो मैं कहीं से इंतजाम करके आपको देता।
पैसे लेकर वागीश चल पड़े..मित्र ने कहा ...कम से कम चाय तो पीते जाइये...
नहीं..बाद में..
फिर तेज पैडल मारते हुए पुनः डॉक्टर के पास पहुंचे
और फिर...
*****
देखियौ न रमजानो आबै बला छै!
एक्कर अब्बा भी शायद ऐथिन... त हम भेज देब!
...कोय बात नै बच्चा ठीक भै क स्कूल आबै लगतै न तब भेज देबै...ठीक छै?
हम आब चलै छी..
इतना कहकर वागीश ने साइकिल घुमायी और विद्यालय की ओर चल पड़े।
विद्यालय पहुँचते ही...प्रधानाध्यापक से सामना हुआ।
क्या वागीश जी?
बच्चे को घर छोड़ने गए कि चाय-नाश्ता करने
क्या कहें आपको,कहते-कहते अब हम उकता गए हैं
नयी-नयी नौकरी है कोई आ जाता जाँच में तो हम क्या जवाब देते?
थोड़ा भी दायित्व-बोध आपमें है ही नहीं!जाइये जल्दी से हाजिरी बनाइये...रे गौतम टिफिन की घण्टी बजाओ...
वागीश भीतर ही भीतर मुस्कुराते हुए कार्यालय के प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ चले।उन्हें "दायित्व-बोध" का मर्म समझ में आ रहा था।

 
©मनीष
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